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JUVENILE DELINQUENCY (बाल –अपराध )


Meaning and Definition of Delinquency (बाल अपराध का अर्थ व परिभाषा )
   किशोर अपराध और बाल अपराध लगभग एक समान प्रत्यय हैं,किंतु कुछ लोग बाल अपराध पर अधिक बल देते हैं, अतः उस पर पृथक से विचार किया जा रहा है।
     वर्तमान समय में हम देखते हैं, की बालकों में भी कानून का उल्लंघन करने की प्रवृत्ति का विकास होता जा रहा है ।  वयस्क जब अपराध करते हैं, तो उन्हें जेल भेजने का प्रयत्न किया जाता है।कुछ समय पूर्व बालकों को भी अपराध करने पर जेल भेजा जाता था, किंतु लोगों ने इस समस्या पर विचार करना प्रारम्भ कर दिया। अखिल बालक अपराध क्यों करते हैं? समाजशास्त्रियों एवं मनोवैज्ञानिकों ने इन प्रश्नों का उत्तर खोजने का प्रयत्न किया है। इसलिए हम बाल अपराध के कारणों पर विचार करेंगे किंतु कारणों को जानने से पहले बाल अपराध को समझना अत्यंत आवश्यक है।
   What is child Delinquency?(बाल अपराध क्या है?)
सभ्यता के पथ पर बढ़ते हुए समाज ने अपने अंदर अनेकों परिवर्तन किये हैं।समाज का उचित संचालन करने के लिए समाज ने स्वयं ही कुछ नियमों का निर्माण किया है।इन नियमों का पालन करना समाज के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य है। इन नियमों का पालन न करना ही अपराध है।हम सब यह जानते हैं कि देश की  बाह्य एवं आंतरिक रक्षा करना सरकार का एक प्रमुख कार्य है।जनता के जानमाल की रक्षा के लिए सरकार कुछ नियम बना देती है। इन नियमों का पालन न करना अपराध है। दूसरे शब्दों में कानून का उल्लंघन करना अपराध कहा जाता है।
               जब कोई व्यक्ति कानून का उल्लंघन प्रथम बार करता है। अर्थात उसमें अपराध का प्रारंभ ही हुआ है, तो उसे कानून की भाषा में ‘ऑफेंडर’(offender) कहा जाता है। ‘ऑफेंडर’ (offender) को  हम अपनी भाषा में   दोषी कह सकते हैं। जिस व्यक्ति में अपराध की प्रवृत्ति आ जाती है उसे हम ‘डिˈलिङ्‌क्‍वन्‍ट्‌’(delinquent) कहते हैं।‘डˈलिङ्‌क्‍वन्‍ट्‌’(delinquent) शब्द को हम संस्कृत में गर्भित हिंदी में कदाचारी कह सकते हैं। इसमें अपराध की प्रवृत्ति के साथ-साथ अपराध की क्रिया भी होती है अर्थात कदाचारी अपराध करता भी है। अपराधी श्रेणी आती है, जिसे अंग्रेजी में क्रिमिनल कहते हैं। इस प्रकार हम देख रहे हैं कि अपराधियों की तीन श्रेणियां हैं–दोषी, कदाचार एवं अपराधी हमारा सम्बन्ध यहां पर दूसरी श्रेणी के अपराधियों से विशेष रूप से है।
                  भारतीय  दण्ड संहिता  की धारा 82 के अंतर्गत यह बात स्पष्ट कर दी गई है कि जो बालक 7 वर्ष की आयु के बालक अपने अपराधों के लिए स्वयं उत्तरदाई नहीं है। इसी सहित संहिता की धारा 83 में आयु को 12 वर्ष तक कर दिया गया है। इस धारा में यह लिखा गया है कि जो बालक अपराध करते समय अपने कदाचार के परिणामों को समझने में असमर्थ है एवं जिनकी बुद्धि में अभी परिपक्वता नहीं आई है; वे यदि 12 वर्ष तक की आयु के भी हो, तो अपराध के दण्ड के लिए स्वयं भागी नहीं होंगे। कानून की भाषा में इस आयु को सुरक्षात्मक आयु कहा जाता है।
                  सुरक्षात्मक आयु के ऊपर 15 वर्ष की आयु तक के बालक यदि अपराध करते हैं तो उन्हें बाल दोषी की संज्ञा दी जाती है। किसी –किसी राज्य में बाल दोषी को सुरक्षात्मक आयु तथा 14 अथवा 16 वर्ष की आयु के बीच का माना जाता है।प्रत्येक राज्य में बाल दोषी के हितों को ध्यान में रखते हुए कानून बने हैं। बाल दोषी को कठोर कारावास से सदैव मुक्त रखा जाता है।
                      बाल दोषी  के पश्चात आयु की दृष्टि से नवयुवक  दोषी का नंबर आता है। नवयुवक दोषी 14,15 अथवा 16 वर्ष की आयु के ऊपर होता है। नवयुवक दोषी की आयु की उच्चतम सीमा में राज्यों में भीन्नता है। कुछ राज्यों में इस आयु की उच्चतम सीमा 21 वर्ष है। उत्तर प्रदेश में 15 वर्ष की आयु ही अपराधों से सुरक्षा की उच्चतम सीमा है।15 वर्ष के ऊपर के अपराधियों के साथ उत्तर प्रदेश में सामान्य  अपराधियों की भांति ही व्यवहार किया जाता है। आसाम ,मुंबई तथा दिल्ली में यह आयु 16 वर्ष है।बिहार राज्य में 20 वर्ष की आयु तक अपराधियों को    कठोर दण्ड से सुरक्षित रखने का प्रयत्न किया जाता है। अंडमान और निकोबार दीप समूह में 22 वर्ष तक के पौढो के लिए यह सुविधा प्रदान की गई है।इस प्रकार आयु की दृष्टि से अपराधियों को हम निम्नलिखित चार श्रेणियों  में रख सकते हैं–
      1. सुरक्षात्मक आयु के नीचे अपराधी
      2. सुरक्षात्मक आयु तथा 14,15 अथवा कहीं-कहीं                     
 16  वर्ष के बीच के बाल दोषी।   
       3.बाल दोषी की आयु के ऊपर किन्तु आयु की एक निश्चित  उच्चतम सीमा के नीचे के नवयुवक दोषी तथा राज्य द्वारा स्वीकृत आयु की उच्चतम सीमा के ऊपर के वयस्क अपराधी।

               वयस्क अपराधी अपने अपराध का  स्वयं उतराधी हैं।वह अपने अपराध के अनुसार आर्थिक  दण्ड– कठोर कारावास अथवा आजन्म कारावास के दण्ड का भागी होता है। बाल अपराधी को इन  यातनाओं का सामना नहीं करना पड़ता है।बाल अपराधी से हम बाल दोषी तथा नवयुवक–दोषी  दोनों का तात्पर्य इसमें बाल अपराधी को इसी अर्थ में प्रयुक्त किया जाएगा।
               बाल अपराध कई रूपों में देखा जा सकता है। बाल अपराधी किसी व्यक्ति की किसी वस्तु को चुरा सकता है। चोरी के अंतर्गत हम कई वस्तुओं को ले सकते हैं।कलम पेंसिल ,स्लेट, तख्ती जैसी छोटी चीजें से लेकर रूपए पैसे जैसी बड़ी –से– बड़ी वस्तुएं भी  बालकों द्वारा चुराई जा सकती है।
               बालक डाकुओं की संगति भी कर सकते हैं कभी– कभी  वयस्क डाकू अपने दिल की सफलता के लिये  भी  स्त्रियों , बालकों   एवं बालिकाओं को अपने दल में शामिल कर लेते हैं। ऐसी बालक कालांतर में चलकर स्वयं भी  डाकू बन जाते हैं।कुछ बालक वीर –पूजा की भावना से ओत–प्रोत होकर डाकुओं की दल में शामिल हो जाते हैं।
                 कुछ बालक जेब काटने की कला सीख जाते हैं। रेल के डिब्बे में दो-तीन बालक मिलकर कभी-कभी गाना गाने लगते हैं।लोगों का ध्यान गाने की ओर जाते ही कोई अन्य बालक (जो प्राय: आपस में सांठ–गांठ किये रहते हैं)यात्रियों की जेबों पर   ध्यान जमा देता है ।  भीड़ में तो कहना ही क्या है।बस से उतरते समय या उस पर चढ़ते समय यात्रियों की जेब काटकर सभी रुपए निकाल लेना इनके बाएं हाथ का खेल है।
                 किसी मंदिर में दर्शनाथ  जाती हुई भीड़ में भी जेब काटने की घटनाएं घट जाती है ।बाहर उतारे हुए जूते भी कभी-कभी गायब हो जाते हैं।
                 बिना टिकट यात्रा करना,टिकट लिए बिना लाइन में खड़े ही टिकट लेने का प्रयत्न करना, डिब्बे में पूरी सीट पर कब्जा किए रहना तथा अन्य मुसाफिरों को खड़ा रखना, बिना आवश्यकता के ही जंजीर खींच लेना, रेलवे की संपत्ति को चुरा लेना अथवा नष्ट करना, रेलवे कर्मचारियों को परेशान करना और कभी-कभी पिट भी देना आदि ऐसे कार्य हैं जो रेलवे के कानून के विरुद्ध है। यदि कोई बालक ऐसा कार्य करता है, तो उस कार्य को हम बाल अपराध के अंतर्गत ही लेंगे।
                             कभी-कभी बालक आबकारी के नियमों का उल्लंघन भी करते हैं। गांजा, चरस ,अफीम आदि का भी ये खुल्लम –खुल्ला सेवन करते हैं। शराब पीने का कुटेब भी पड़ जाती है। महुए  से शराब बनाना भी ऐसे बालक सीख लेते हैं। और चोरी से शराब बनाकर पीते हैं।
                             सार्वजनिक संपत्ति को भी बालक हानि पहुंचा सकते हैं। सार्वजनिक स्थान पर लहराते हुए तिरंगे झंडे को फाड़ सकते हैं। गांधी –चबूतरा को नष्ट कर सकते हैं। पंचायत घर की बलियो को हटाकर उसके छप्पर और खपरैल को नष्ट कर सकते हैं। इसी प्रकार के अन्य सार्वजनिक स्थानों को वह गंदा कर सकते हैं।
                             कुछ बालकों में चारित्रिक दोष आ जाते हैं वे अपने से छोटे बालकों का चरित्र भ्रष्ट करने पर तुल जाते हैं।किसी लड़की को एकांत में पाकर उसके साथ बलात्कार करना प्रारंभ  कर देते हैं। चौराहे पर खड़े होकर अपशब्द बकते हैं। किसी चुपचाप चली जा रही बालिका पर ताने कसने लगते हैं। इसी प्रकार के अन्य अपराध भी  बालक कर बैठता है। नियमों का उल्लंघन करना अपराध है। बालक कभी-कभी बिना जाने समझे अपराध करता है कभी-कभी वह जानबूझकर अपराध करता है।
                             प्रसिद्ध समाजशास्त्री एलियेट (Aliyet) एवं उनके सहयोगी मैं मैरिल (Mairil) ने अपराध का स्पष्टीकरण इस प्रकार किया है–“अपराध एक कार्य है, जो कानून द्वारा वर्जित है, जीसके  कर्ता को मृत्युदंड ,जुर्माना ,जेल, न्यायालय या  सुधार गृह में बन्द, जीवन व्यतीत करने के लिए दण्ड  दिया जा सकता है”
                             विभिन्न देशों में बाल अपराधियों की न्यूनतम और उच्चतम आयु विभिन्न है ।भारत में उसी बालक या किशोर का समाज विरोधी कार्य ‘अपराध’ माना जाता है, जिसकी की न्यूनतम आयु 7 वर्ष और अधिकतम आयु 16 वर्ष की होती है।

    Causes of Delinquency ( बाल –अपराध के कारण)
      मैडीनस व जॉनसन का मत है–“सामाजिक समस्या के रूप में बाल अपराध  में वृद्धि होती हुई जान पड़ती है। यह वृद्धि कुछ तो जनसंख्या की सामान्य वृद्धि के परिणामस्वरूप और कुछ जनसंख्या के अधिक भाग के ग्रामीण वातावरण के बजाय शहरी वातावरण में रहने की परिणामस्वरूप  हो रही है।”
             “ Delinquency, as a social problem appears to be on the increase. Same of this increase results from a general increase in population, and sum of it results from the fact that an from the increasingly high proportion of the population lives in urban rather than rural environment.”
                —Medinnus and Johnson

  हम इस   वृद्धि की व्याख्या, बाल अपराध के कारणों के आधार पर ही कर सकते हैं यह कारण निम्नलिखित हैं–
1. अनुवांशिक कारण (Hereditary Causes)
2. शारीरिक कारण (Physiological Reasons)
3. मनोवैज्ञानिक कारण(Psychological Reasons)
4. सामाजिक कारण (social Reasons)
5. पारिवारिक कारण (Family related Causes)
6. विद्यालय– सम्बन्धी कारण (School Related Causes)
7. संवाद –वाहन के साधन(Media of Communication )
8. सांस्कृतिक कारण (Cultural Factors)

1.अनुवांशिक कारण (Hereditary Causes)
a. Criminal Tendency(अपराधी– प्रवृत्ति) –अनेक मनोवैज्ञानिकों का मत है कि बाल– अपराधियों का जन्म होता है ( Delinquents are born.)। इन मनोवैज्ञानिकों में लोब्ररोसो, मौडस्ले( Lombroso,Maudsley) और डगडेल (Dugdale) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।  उन्होंने अपने अन्वेषण   से सिद्ध किया है कि बालकों को अपराधी –प्रवृत्ति अपने माता –पिता से वंशानुक्रम  द्वारा प्राप्त होती है। इसलिए , वैलेनटीन( valentine)  ने लिखा है–“अनुवांशिक लक्षण,अपराधी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करते हैं।”
b. Chromosom(उत्पादक गुण–सूत्र)–Medinnus and Johnson (मैडीनस एवं जानसन) ने लिखा है कि व्यक्तियों  में साधारण दो प्रकार के उत्पादक गुणसूत्र(sex chromosome) होते हैं–स्त्रियों में XX और पुरुषों में XY।असाधारण दशाओं में कुछ स्त्रियों में केवल X गुणसूत्र और मनुष्य में XYY गुणसूत्र होते हैं। ऐसे मनुष्य बाल अपराधियों को जन्म देते हैं।                2. Physical Causes (शारीरिक कारण)–
   a. Physical Defects(शारीरिक दोष )–बालक की शारीरिक दोष उसके तिरस्कर का कारण बनते हैं।  इस तिरस्कार से उसके आत्म–सम्मान को ठेस पहुंचती है। फलस्वरूप, वह  तिरस्कार का  बदला लेने के लिए दूसरों को कष्ट देने और सताने का अपराध करने लगता है। किल्फॉर्ड मैमसैट(Clifford Mamshabt) ने  इसका एक उदाहरण दिया है। एक बालक की आंखें कमजोर थी और वह पढ़ नहीं सकता था। दूसरी लड़की उसका मजाक उड़ाते थे। उसके आत्म–सम्मान को चोट लगती थी। अच्छा उसने चश्मा लगाने वाले लड़कों के चक्कर चुराने आरंभ कर दिए। पहले तो उसने ऐसा उनको तंग करने के लिए किया, पर धीरे– धीरे उसकी चोरी करने की आदत पड़ गई।
   b. Rapid Development  of sex Organs ( यौनांगों का तीव्र विकास)–जिन बालकों और बालिकाओं के यौनांगों का तीव्र  विकास होता है, अनेक प्रकार के काम– सम्बन्धी अपराध करने लगते हैं, जैसे –हस्तमैथुन और सम या विषमलिंग की व्यक्तियों से  सम्भोग।
3. Psychology Causes (मनोवैज्ञानिक कारण)–
  a. Low Intelligence (निम्न सामान्य विधि)–निम्न समान गति वाले बालों को अपराध प्रवृति के तरलता से विकास होता है। वैलेंटिन (valentine) ने लिखा है बर्ट (Burt) ने जिन बाल –अपराधियों का अध्ययन किया है, उनमें से 4 / 5 में औसत से कम बुद्धि थी, अत: उनकी बुद्धि लब्धि(IQ power) 100 से कम थी।
b. Mental Diseases (मानसिक रोग )–बालकों के मानसिक रोग उनको अपराधी बनाने के लिए उत्तरदाई होते हैं।इन रोगों से ग्रस्त बालकों में मानसिक तनाव, विचार शून्यता , असंतुलन वर अतंवर्ध उत्पन्न हो जाता है। ऐसी दशा में वे अपना नियंत्रण खोने के कारण अपराध कर बैठते हैं।
4. social Reasons (सामाजिक कारण )
a.Companions (साथी )–अकेले बालक बहुत कम अपराध करता है, उसके साथ  प्राय: कोई– न–कोई होता है तो वह जदा अपराध करता है। ग्लूक (Glueck) अपने अन्वेषण से सिद्ध किया है कि जींस 500 अपराधी बालकों का उसने अध्ययन किया, 95%शराबियों ,जुआरियों , व्यभिचारीयों और गुंडों की संगति में रहे थे। हीली (Healy) ने बताया है कि अपराधी बालक किसी न किसी गुट के सदस्य अवश्य होते हैं। अत: हम कह सकते हैं कि बालक बुरे साथियों की संगति में पडकर अपराध करते हैं।
b. Division of country (देश का विभाजन )—इस कारण का भारत से विशेष संबंध है। आजादी के पूर्व  यहां बाल –अपराधों की संख्या बहुत कम थी। विभाजन के कारण देश  में हिंदू– मुस्लिम सांप्रदायिक झगड़ों  झगड़ों का तांता लग गया । इनमें वयस्कों के अलावा किशोरों ने विशेष रूप से भाग लिया।  फलस्वरूप कुछ समय तक बाल –अपराधों की दरों में बहुत तेजी से वृद्धि  हुई है।
5. Family-Related Causes (पारिवारिक कारण)—
 a. Broken Homes (भग्न परिवार)—बर्बाद परिवार (Broken Home) हमारा अभिप्राय उस परिवार से है, जिसे जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कोई साधन उपलब्ध नहीं होता है। ऐसा उस दशा में होता है, जब परिवार में कमाने वाला की मृत्यु हो जाए या वह अलग हो जाये या अनैतिकता का मार्ग अपनाकर किसी की चिंता नहीं करता है। एसी दशा में उसके परिवार के बालक,अपराध करने की ओर प्रवृत्त होते हैं। जानसन (Johnson) ने अपराधी बालकों के आंकड़े एकत्र करने पर यह पाया कि उनमें से 52% बर्बाद परिवारों के थे।
 b. Immoral Family ( अनैतिक परिवार)—जिस परिवार में माता-पिता या अन्य सदस्य अनैतिक होते हैं उसके बच्चे भी उन्हीं के समान होते हैं। क्योंकि बच्चे सबसे पहले अपने घर परिवार से ही सीखते हैं।मेबिल इलियट (Meble Elliot) ने अमेरिका के स्लाटन फार्म (Slaten Farm) पर  अपराधी लड़कियों का अध्ययन करने पर यह पाया कि उनमें 67% लड़कियां अनैतिक परिवारों की थी।
 c. Family Environment(परिवार का वातावरण)—यदि बच्चों के भाई-बहन अपराधी हैं, यदि उनके माता-पिता उनको कठोर अनुशासन में रखते हैं, यदि परिवार के सदस्य आपस में लड़ते– झगड़ते हैं,यदि  बच्चों पर  शिथिल नियंत्रण है, तो वे अपराध के मार्ग पर चलने लगते हैं ।यदि घर में उनके खेलने के लिए स्थान नहीं होता है,तो वे गलियों में घूमने लगते हैं और बुरी संगति में पढ़कर अपराधी बन जाते हैं।
 6. School Related Causes (विद्यालय  सम्बन्धी कारण)
 a. Situation (स्थिति )—हमारे देश में ऐसे अनेक विद्यालय है,जो नगर के दूषित और कोलाहल पुणे भागों में स्थित है। बालक वहां जाते हुए प्रतिदिन विभिन्न प्रकार के अमानवीय कृत्य देखते हैं । कुछ बालक उनसे प्रभावित  होकर उनको अपने जीवन का अंग बना लेते हैं।
 b. Lack of control (नियंत्रण का अभाव)—आजकल के विद्यालय, शिक्षा की दुकानें हो गई हैं, जिनमें धन प्राप्त करने के लिए संख्या की ओर ध्यान दिए बिना बालक को को भर लिया जाता है । ऐसे विद्यालयों में बालकों पर किसी प्रकार का नियंत्रण नहीं होता है। फलस्वरूप वे अपनी इच्छा अनुसार कहीं भी घूमने के लिए  या सिनेमा देखने के लिए जा सकते हैं। इस प्रकार के बालक क्रमशः बाल अपराध के मार्ग को ग्रहण करते हैं।
 c. Lack of Recreation and Games (खेल व मनोरंजन का अभाव)–इस समय भारतीय नेताओं को शिक्षा का प्रसार करने की धुन सवार है ।अतः विद्यालयों को मान्यता प्राप्त करने के समय इस बात पर रंचमात्र भी ध्यान नहीं दिया जाता है कि उनके पास बालकों के लिए खेल का पर्याप्त स्थान है या नहीं। विद्यालय भी खेल पर धन व्यय करना मूर्खता समझते हैं। खेल की व्यवस्था न होने के कारण  बालकों के अनेक संवेग दमित अवस्था में पड़े रहते हैं, जो उभरने पर अति घातक सिद्ध होते हैं। यह बालक को को न केवल  असमायोजित   कर देते हैं, बल्कि उनको विविध प्रकार के अपराध करने के लिए भी प्रेरित करते हैं।
 7. Media of communication( संवाद –वाहन के कारण)
 a. Television (टेलीविजन )—टेलीविजन के संबंध में अब तक तीन विस्तृत अध्ययन हुए हैं –1958 में इंग्लैंड में, 1961 में अमेरिका में और 1962 में जापान में। इन  अध्ययनों के आधार पर इसको बाल– अपराधों के लिए चलचित्र से अधिक दोषी ठहराया गया है। बैना, मैडिसिन एवं जानसन का विचार है–“ मैं विश्वास करता हूं कि तरुण और परेशान किशोरों के लिए टेलीविजन बाल –अपराध का प्रारंभिक प्रशिक्षण केंद्र है।”
 b. Movies(चलचित्र )–ब्लूमर एवं हौजर (blumer and hauser, Movies, Delinquency and crime) ने लिखा है कि चलचित्र –धन प्राप्त करने की अनुचित विधियों का सुझाव देकर, कामवासनाओं को भड़का कर और कुतिस्क कार्यों को प्रदर्शित करके बाल अपराधों में अधिक सहयोग देते हैं।
 8.  Cultural factors(सांस्कृतिक कारक ) –आधुनिक युग में हमारे जीवन के समान हमारी संस्कृति  भी  कृत्रिम क्र हो गई है ।उसके अर्थ और महत्व का लोप हो गया है। वह व्यस्को, किशोरों और बालकों की आवश्यकताओं को पूरा करने में असफल हो रही है। अतः बालक और किशोर उससे अपना  सम्बन्ध– विच्छेद करके समाज –विरोधी कार्यो में संलग्न होते हुए दिखाई दे रहे हैं।
 

Comments

Vivek said…
Nice 😊👍😊👍😊

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